हम बचपन से फरिश्तों की कहानियाँ सुनते आये हैं,
उधड़ी सी ज़िन्दगी में किरणों की लौ बुनते आये हैं,
इसी उधड़ बन में ज़िन्दगी चल रही थी,
उम्मीदों की किरण धीरे धीरे ढल रही थी,
दवाओं का असर काम हो चुका था,
एहसास भी अब तो नाम हो चुका था,
अब तो बीमारी भी मेरी लाइलाज ही चली थी,
दवाएँ भी बिल्कुल बेकार हो चली थी।
फिर सोचा की दवाओं का कुछ तो इस्तेमाल कर लें,
सुकून के उस फरिश्ते से इस्तकबाल कर लें,
उस वक़्त बस हमे ना कुछ सवाल आया,
ना अपनों ना गैरों का ख़याल आया,
मेहबूब से मोहब्बत बयान भी नहीं की थी,
अब तक तो पूरी वफ़ा भी नहीं की थी,
भेजा कुछ अपनों को हमने आख़री सलाम,
दर्द से लिया था हमने आख़री इन्तेक़ाम।
हर कोशिश की तरह यह कोशिश भी नाकाम हो गयी,
बेहोशी में चंद अपनों को करीब पाया,
हमारी आख़री कोशिश भी हो गयी थी ज़ाया,
परदेस के नियम कानून कुछ अलग थे,
मौत की कोशिशों को लेके यह लोग काफी सजग थे,
हो गए थे हम बेबस, लाचार, मजबूर,
कर दिया था हमे सबसे बहुत दूर।
कैदी बना के रखा था हमे अस्पताल में,
घिरे थे हम जैसे राक्षसों से पाताल में,
तकिये में मुँह छिपकर बहुत रोया करते थे,
आज़ाद होने का सपने खुली आखों से पिरोया करते थे,
उनकी आवाज़ सुनने को तरस जाया करते थे,
दिन में एक दो बार बात करके बरस जाया करते थे,
हिम्मत रखो तुम सब ठीक होगा वो कहा करते थे,
उन्हें बाहों में भरने को हम मरा करते थे।
अस्पताल का दाना पानी जँचता नहीं था,
उन्हें देखे बिना दिन कटता नहीं था,
उन्होंने हमें बहुत मोहब्बत से समझाया,
रिहा हो जायेंगे हम, ये भरोसा हमें दिलाया,
अभी तो बस कुछ वक़्त ही गुज़रा था,
ना जाने अभी और कितने दिनों का पहरा था।
खुदा ने फुरसत में हमारी दुआ पे शायद गौर फ़रमाया था,
अस्पताल के हकीम में हमें फ़रिश्ता नज़र आया था,
किसी ने सच ही कहा है इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता,
कौन कहता है की पडोसी मुल्क के लोगों का दिल नरम नहीं होता।
समझी उन्होंने हमारी तकलीफ़, हालात और जज़्बात,
कहा हमसे की खुशनसीब और समझदार हैं हम,
अमन और क़ामयाबी के बराबर हक़दार हैं हम,
रिहा हुए हम उस क़ैदखाने से,
एक नयी उम्मींद मिली है हमें ज़माने से,
मेहबूब की मोहब्बत और वफ़ा साथ लेके चले थे,
उस हक़ीम उस फ़रिश्ते से ज़िन्दगी की सौगात लेके चले थे।
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